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Showing posts from 2014

वर्ग-संघर्ष से तय होगा दुनिया का भविष्य - माइकल शूमैन

मार्क्स की पुनर्प्रासंगिकता लंदन के हाईगेट कब्रिस्तान में दफनाए गए जर्मन दार्शनिक और आर्थिक सिद्धांतकार कार्ल मार्क्स को आधुनिक समाजवाद और साम्यवाद के संस्थापक के रूप में याद किया जाता है। उनकी मृत्यु के बाद ऐसा माना जाता   रहा कि मरणोपरांत उन्हें दफन कर (भुला) दिया गया है। सोवियत संघ के विघटन और चीन द्वारा पूँजीवाद में   बड़ी छलाँग के साथ , जेम्स बॉन्ड की फिल्मों या किम जोंग उन के विचित्र मंत्र की आकर्षक पृष्ठभूमि में   साम्यवाद धुँधला पड़ गया। जिस वर्ग-संघर्ष को मार्क्स ने इतिहास की दिशा तय करने वाला माना था , ऐसा   लगने लगा कि वह मुक्त व्यापार और मुक्त उद्योग के फलते-फूलते युग में कहीं लुप्त हो गया। धरती के   कोने-कोने को पूँजी के लुभावने जाल में फँसाने की वैश्वीकरण की व्यापक शक्ति , आउटसोर्सिंग और ‘ असीम ’   उत्पादन ने सिलिकॉन वैली के प्रौद्योगिकी-विशेषज्ञों से लेकर चीन की खेतिहर लड़कियों तक , सभी को अमीर बनने के   भरपूर अवसर दिए। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में एशिया , शायद मानव इतिहास में गरीबी की कमी के सबसे उल्लेखनीय कीर्तिमान का गवाह बना – और यह सब संभव हुआ व्यापार , उद्

राकेश कुमार शंखधर की दो कविताएं

कभी-कभार के लेखन को संकोचपूर्वक सामने लाते हुए श्री राकेश कुमार शंखधर ने जो दो कविताएँ हमें दीं , उन्हें हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। ये कविताएँ हम में से बहुतों की अनुभूति हैं , लिहाजा इनसे जुड़ना हमें बड़ा सुखद लगता है। विशेषकर ‘ गाँव! तुम ज़िंदा रहना ’ कविता के अंत में व्यक्त कवि का संकल्प महानगर में रहने को अभिशप्त हर इंसान दोहराना चाहता है। इसी तरह , ‘ माँ ’ कविता में आयी एक पंक्ति ‘ बंधनों से जकड़ी हुई पूरी उम्र... ’   स्त्री जीवन और उस पर चल रही समकालीन बहसों में एक सक्रिय हस्तक्षेप के रूप में हमारा ध्यान खींचती है।   इन कविताओं को सामने लाने में मणिपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यापक और मेरे सहपाठी रहे मित्र अखिलेश शंखधर की पहलकदमी की बड़ी भूमिका रही। राकेश शंखधर भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं और बेलापुर , नवी मुम्बई में रहते हैं। सम्पर्क: rk.shankhdhar@sbi.co.in   गाँव ! तुम ज़िंदा रहना   गाँव ! मैं लौटूंगा एक दिन अवश्य तुम्हारे पास और डाल दूंगा पड़ाव वहीं किंतु तब तक तुम ज़िंदा रहना।     तुम बचाए रखना मिट्टी का

हिंदी पत्रिकाएँ - कथादेश, जुलाई 2014 के बहाने

हिंदी की पत्रिकाओं को पैसे जुटाने से ज्यादा फिक्र अपने काम की करनी चाहिए। पत्रिका का सम्पादक ज़रा समर्पित किस्म का व्यक्ति होना चाहिए। वह पढ़ा-लिखा और भाषा का जानकार हो तो और भी अच्छा। सम्पादन और प्रूफशोधन को अब अलग-अलग करके देखने का समय नहीं रह गया है। पत्रिका की फाइनल कॉपी जो भी व्यक्ति तैयार करे उसे निर्णय लेने में समर्थ भी होना चाहिए। वह सम्पादक/ मालिक का कारिंदा भर न हो। पत्रिकाओं के प्रकाशक-सम्पादकगण जब पैसे की कमी का रोना रोते हैं तब उनकी दीनता देखने लायक होती है , लेकिन कंटेंट के मसले पर वे पाठक की कोई बात सुनने-समझने-मानने को तैयार नहीं होते। ये लोग पूरे भिखारी बने रहना चाहते हैं। आप तो बस भीख दीजिए , उस पैसे से ये दारू पिएँ या चरस , आपको कुछ अख्तियार नहीं।          लेकिन प्रगतिशील विचारों की वाहक पत्रिकाओं को पढ़ने वाले कोई धर्मभीरु तो होते नहीं कि आस्था के चलते भीख देते रहेंगे और अगला जनम संवारने की कल्पना में चरस-दारू का व्यापार भी परोक्षत: चलता रहेगा। हाल के वर्षों में पत्रिकाओं के मुद्रण में बरती जा रही लापरवाहियों की तरफ ध्यान दें तो लगता है कि जो लोग इस काम में