वर्ग-संघर्ष से तय होगा दुनिया का भविष्य - माइकल शूमैन

मार्क्स की पुनर्प्रासंगिकता

लंदन के हाईगेट कब्रिस्तान में दफनाए गए जर्मन दार्शनिक और आर्थिक सिद्धांतकार कार्ल मार्क्स को आधुनिक समाजवाद और साम्यवाद के संस्थापक के रूप में याद किया जाता है। उनकी मृत्यु के बाद ऐसा माना जाता  रहा कि मरणोपरांत उन्हें दफन कर (भुला) दिया गया है। सोवियत संघ के विघटन और चीन द्वारा पूँजीवाद में  बड़ी छलाँग के साथ, जेम्स बॉन्ड की फिल्मों या किम जोंग उन के विचित्र मंत्र की आकर्षक पृष्ठभूमि में  साम्यवाद धुँधला पड़ गया। जिस वर्ग-संघर्ष को मार्क्स ने इतिहास की दिशा तय करने वाला माना था, ऐसा  लगने लगा कि वह मुक्त व्यापार और मुक्त उद्योग के फलते-फूलते युग में कहीं लुप्त हो गया। धरती के  कोने-कोने को पूँजी के लुभावने जाल में फँसाने की वैश्वीकरण की व्यापक शक्ति, आउटसोर्सिंग और असीम  उत्पादन ने सिलिकॉन वैली के प्रौद्योगिकी-विशेषज्ञों से लेकर चीन की खेतिहर लड़कियों तक, सभी को अमीर बनने के  भरपूर अवसर दिए। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में एशिया, शायद मानव इतिहास में गरीबी की कमी के सबसे उल्लेखनीय कीर्तिमान का गवाह बना – और यह सब संभव हुआ व्यापार, उद्यमिता और विदेशी निवेश के धुर पूँजीवादी उपकरणों की मदद से। ऐसा लगा कि पूँजीवाद हर किसी को समृद्धि और लाभ की नई ऊँचाइयों पर ले जाने का अपना वादा निभा रहा है।                      

विश्व अर्थव्यवस्था के लम्बे खिंचे संकट, और दुनिया भर में बेकारी, कर्ज़; और आमदनी बंद होने से बेहाल कामगारों को देखते हुए मार्क्स द्वारा पूँजीवाद की तीखी आलोचना – कि यह व्यवस्था अपने आप में ही अन्यायपूर्ण और आत्मघाती है – को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। मार्क्स ने लिखा था, “एक तरफ सम्पत्ति के अम्बार से दूसरी तरफ उसी समय दुख, श्रम की पीड़ा, गुलामी, अज्ञानता, नृशंसता, दिमागी ह्रास का अम्बार लगता है।” उनका कहना था कि पूँजीवादी व्यवस्था हर हाल में ज्यादा से ज्यादा लोगों को कमज़ोर बनाएगी क्योंकि दुनिया भर की दौलत चंद लालची लोगों की मुट्ठियों में कैद होने पर आर्थिक संकट पैदा होंगे और अमीरों तथा कामगार वर्गों के बीच अंतर्विरोध बढ़ेंगे।

इस बात के प्रमाणों की बढ़ती संख्या को देखकर लगता है कि वे सही थे। दुर्भाग्यवश, बड़ी सरलता से इस बात के आँकड़े खोजे जा सकते हैं जो यह दिखाते हैं कि अमीर लोग और अधिक अमीर होते जा रहे हैं जब कि मध्य वर्ग के लोग और गरीब लोग अमीर नहीं हो रहे हैं। वाशिंगटन में इकनॉमिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ई.पी.आई.) के एक अध्ययन में पाया गया है कि अमेरिका में 2011 में एक पूर्णकालिक पुरुष कर्मचारी की 48, 202 डॉलर की औसत वार्षिक आय 1973 की औसत वार्षिक आय से कम थी। ई.पी.आई. के आकलन के अनुसार, 1983 से 2010 के बीच, अमेरिका में सम्पत्ति के लाभ का 74% भाग 5% सबसे अमीर लोगों को मिला, जबकि नीचे के 60% लोगों को हानि उठानी पड़ी, मतलब कि वे और भी गरीब हुए। ऐसे में कुछ लोगों द्वारा 19वीं सदी के जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स के विचारों की ओर लौटना कतई आश्चर्यजनक नहीं है। मार्क्सवादी देश चीन, जिसने मार्क्स को भुला दिया था, वहीं के यू रोंगजुन को वैश्विक घटनाओं को देखकर मार्क्स की महान कृति दास कैपिटल पर आधारित संगीत-नाटक लिखने की प्रेरणा मिली। नाटककार के अनुसार, “इस पुस्तक (कैपिटल) में जो वर्णन किया गया है, उसमें, और आज के यथार्थ में समानता देखने को मिलती है।”          
ऐसा भी नहीं है कि मार्क्स की सारी की सारी बातें पूरी तरह सही ही साबित हुई हों। उनका “सर्वहारा के अधिनायकत्व” का सिद्धांत तो उस प्रकार बिल्कुल सफल नहीं हुआ जैसी उन्होंने उसकी योजना बनायी थी। लेकिन आज की तारीख में इस बढ़ती हुई असमानता का परिणाम वही हुआ है, जिसकी मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी : वर्ग संघर्ष की वापसी हुई है। सारी दुनिया के कामगारों का गुस्सा बढ़ रहा है और वे विश्व अर्थव्यवस्था में अपना वाजिब हिस्सा माँग रहे हैं। अमेरिकी कांग्रेस की चौखट हो, एथेंस की गलियाँ हों या दक्षिणी चीन के चौराहे, सर्वत्र पूँजी और श्रम के बीच बढ़ता तनाव राजनीतिक और आर्थिक परिघटनाओं की  दिशा तय कर रहा है। इस दर्ज़े का तनाव 20वीं सदी की कम्युनिस्ट क्रांति के समय से लेकर अब तक पहले कभी नहीं देखा गया। इस संघर्ष के नतीज़े वैश्विक आर्थिक नीतियों की दिशा को प्रभावित करेंगे। इसी से कल्याणकारी राज्य का भविष्य तय होगा, चीन में राजनीतिक स्थिरता के सवाल का जवाब भी इसी से मिलेगा और इसी से यह भी तय होगा कि रोम से वाशिंगटन तक किसका राज चलेगा। आज मार्क्स होते तो क्या कहते? शायद ऐसा ही कुछ – कि देखो, मैंने कहा था न....   न्यूयॉर्क के मार्क्सवादी अर्थशास्त्री रिचर्ड वूल्फ कहते हैं, “लोगों की आमदनी में अंतर से जिस स्तर का तनाव उत्पन्न हो रहा है वैसा मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में नहीं देखा।”

अमेरिका के आर्थिक वर्गों के बीच तनाव के उभार को साफ तौर पर देखा जा सकता है। समाज पूरी तरह से दो हिस्सों में बँटा दिखाई दे रहा है – एक तरह “99%” (संघर्षरत आम लोग) हैं और दूसरी तरफ “1%” (दिन-ब-दिन और भी अमीर होते जा रहे धन्नासेठ)। पिछले वर्ष जारी एक सर्वेक्षण में भाग लेने वाले दो-तिहाई लोगों का मानना था कि अमेरिका अमीर और गरीब के बीच के ज़बर्दस्त या बहुत ज़बर्दस्त सघर्ष से गुज़र रहा है। 2009 से 19 प्रतिशत-बिंदु की बड़ी वृद्धि दर के साथ यह (अमीर-गरीब का विभाजन) समाज का सबसे बड़ा विभाजन बन गया है। इस बढ़े हुए द्वंद्व का अमेरिकी राजनीति पर काफी असर पड़ा है। देश के बजट घाटे को निर्धारित करने का यह निर्णायक संघर्ष बहुत हद तक वर्ग संघर्ष बन गया है। जब-जब राष्ट्रपति बराक ओबामा बजट घाटे के अंतराल को पाटने के लिए अमीरों पर कर बढ़ाने की बात करते हैं तब-तब कंजर्वेटिव लोग यह कहते हुए चिल्लाने लगते हैं कि अमीरों के विरुद्ध वर्ग-युद्ध छेड़ा जा रहा है। फिर भी, रिपब्लिकन लोग खुद अपने ही किसी वर्ग-संघर्ष में उलझे हुए हैं। जी.ओ.पी. की योजना के तहत देश की वित्तीय हालत में सुधार के लिए मध्यवर्ग और गरीब आर्थिक वर्गों को दी जाने वाली सामाजिक सुविधाओं में कटौती करके आर्थिक बोझ के समायोजन को उनके मत्थे मढ़ने का प्रभावी तरीका खोजा गया है। ओबामा ने अपने दूसरे चुनाव अभियान का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर केंद्रित किया कि रिपब्लिकन लोग कामगार वर्गों के प्रति असंवेदनशील हैं। राष्ट्रपति ओबामा ने आरोप लगाया कि जी.ओ.पी. नॉमिनी मिट रोमनी की अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए एकसूत्रीय योजना सिर्फ यही थी कि “यह सुनिश्चित किया जाए कि ऊपर के लोग अलग-अलग नियमों के जरिए फायदा उठा सकें।”

इन्हीं बातों के बीच, हालांकि, इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि इस नए अमेरिकी वर्गवाद की यह बहस अब देश की आर्थिक नीतियों की बहस की ओर मुड़ गयी है। 1% लोगों की सफलता से 99% लोगों को लाभ पहुँहने का दावा करने वाला ट्रिकल-डाउन अर्थशास्त्र अब ज़बर्दस्त संदेह के दायरे में आ गया है। सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस के निदेशक और वाशिंगटन के एक विचारक डेविड मडलैंड का  मानना है कि 2012 के राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार-अभियान से मध्य वर्ग के पुनर्निर्माण, और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक भिन्न आर्थिक एजेंडे की खोज पर नए सिरे से लोगों का ध्यान गया है। उनका कहना है, “अर्थव्यवस्था के बारे में सोचने के तरीके में आमूलचूल परिवर्तन हो रहा है। मैं देख रहा हूँ कि भारी बदलाव घटित हो रहा है

इस नये वर्ग-संघर्ष की ताकत फ्रांस में कहीं ज्यादा मुखर दिखाई दे रही है। विगत मई में, जब आर्थिक मंदी के दंश और बजट कटौती के कारण तमाम आम नागरिकों के लिए अमीर-गरीब का फासला और भी गहरा हो गया तब उन लोगों ने सोशलिस्ट पार्टी के फ्रांसिस हॉलैंड के पक्ष में वोट दिया, जिन्होंने एक बार घोषणा की थी : “मुझे अमीर पसंद नहीं हैं।” उन्होंने अपनी बात को सच साबित किया। उनकी जीत का मंत्र उनके चुनाव अभियान की यह घोषणा ही थी कि अमीर लोगों से और अधिक वसूल कर के फ्रांस के लोक कल्याणकारी राज्य को सँवारा जाएगा। खर्चों में बड़ी कटौतियों से बचने के लिए यूरोप के अन्य नीति-निर्माताओं ने बढ़ते बजट घाटे को बंद करने की शुरुआत की तो हॉलैंड ने आयकर की दर 75% तक बढ़ाने की योजना बनायी। हालांकि यह विचार देश की संवैधानिक परिषद द्वारा अस्वीकार कर दिया गया लेकिन हॉलैंड इसी प्रकार का कोई अन्य उपाय लागू करने के लिए रास्ता तैयार करने की योजना बना रहे हैं। इसी के साथ ही, हॉलैंड ने सरकार को फिर से आम जनोन्मुख बनाया है। उन्होंने अपनी पूर्ववर्ती सरकार के एक अलोकप्रिय फैसले को उलट दिया जिसमें फ्रांस में कुछ कर्मचारियों के लिए सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाकर फिर से मूल 60 वर्ष करने की बात कही गयी थी। फ्रांस में ऐसे तमाम लोग हैं जो चाहते हैं कि हॉलैंड और भी आगे जाएं। एक गैर सरकारी संगठन के विकास अधिकारी शैरलट बॉलैंजर कहते हैं, “हॉलैंड का कर प्रस्ताव सरकार द्वारा इस बात की पहचान किए जाने का पहला कदम है कि अपने वर्तमान रूप में पूँजीवाद इतना अन्यायपूर्ण और विकृत हो चुका है कि यदि इसमें व्यापक बदलाव न किया गया तो इसके अंत:स्फोट का जोखिम है।”

उनकी योजनाओं पर पूँजीवादी वर्ग की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। भले ही माओ त्सेतुंग ने कहा हो कि “राजनैतिक शक्ति बंदूक की नली से विकसित होती है”, लेकिन जिस दुनियां में पूँजी ज्यादा से ज्यादा गतिशील है, वहाँ वर्ग-संघर्ष के हथियार बदल गए हैं। हॉलैंड सरकार को ज्यादा कर चुकाने के बजाय, फ्रांस के कुछ अमीर लोग आवश्यक नौकरियों और निवेश को अपने साथ लेकर देश से बाहर जा रहे हैं। ऑनलाइन खुदरा व्यापार कंपनी pixmania.com के संस्थापक ज्यां एमिल रोज़ेन्ब्लम अपनी ज़िंदगी और नया व्यवसाय दोनों लेकर अमेरिका बसने जा रहे हैं, जहां के बारे में उनका मानना है कि वहाँ का वातावरण उद्योगपतियों के लिए कहीं ज्यादा अनुकूल है। रोज़ेन्ब्लम कहते हैं, “वर्ग-संघर्ष का बढ़ना किसी भी आर्थिक संकट का सामान्य परिणाम है, लेकिन उसका जनोत्तेजक और भेदभावपूर्ण राजनैतिक उपयोग किया गया है। नयी कम्पनियों और रोजगार के अवसरों के सृजन के लिए हमें जहाँ उद्योगपतियों पर निर्भररहने की ज़रूरत है, वहीं फ्रांस से उन्हें बाहर खदेड़ा जा रहा है।”          

अमीर-गरीब का फासला चीन में शायद सबसे ज्यादा अस्थिर है। विडंबना यह है कि ओबामा और साम्यवादी चीन के नवनियुक्त राष्ट्रपति झाई जिनपिंग एक ही चुनौती का सामना कर रहे हैं। बढ़ता हुआ वर्ग-संघर्ष धीमी वृद्धि वाले, कर्ज़ पर आश्रित औद्योगीकृत विश्व की एक घटना मात्र नहीं है। यहाँ तक कि तेज़ी से विकसित हो रहे उभरते बाज़ारों में भी अमीर और गरीब के बीच का तनाव नीति-निर्माताओं के लिए चिंता का सबब बनता जा रहा है।           

अमेरिका और यूरोप के तमाम असंतुष्ट लोग मानते हैं कि चीन तो कामगारों के लिए स्वर्ग ही है, जब कि हकीकत इसके विपरीत है। सबके लिए रोज़गार सुनिश्चित करने की माओ-युग की परम्परा माओवाद के साथ ही धुँधली हो चली थी, और सुधार काल के दौरान कामगारों के पास कुछ अधिकार बचे रहे सके। चीन के शहरों तक में भी पारिश्रमिक आय में काफी बढ़ोत्तरी हो रही है, जिससे अमीर गरीब का फासला बहुत ज्यादा बढ़ गया है। एक अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि इस संबंध में किए गए सर्वेक्षण में शामिल तकरीबन आधे चीनियों ने माना है कि अमीर-गरीब का यह फासला एक बड़ी समस्या है। जबकि 10 में से 8 लोग इस  बात से सहमत थे कि चीन में “अमीर लोग और ज्यादा अमीर हो रहे हैं और गरीब लोग और भी गरीब।”         

चीन के औद्योगिक नगरों में यह असंतोष उफान पर पहुँच रहा है। शेनझेन के दक्षिणी औद्योगिक क्षेत्र के एक फैक्टरी के कर्मचारी पेंग मिंग कहते हैं, “बाहर के लोगों को हमारी ज़िंदगी बड़ी खुशहाल दिखती है, लेकिन फैकटरी का वास्तविक जीवन बिल्कुल अलग है।” अधिक समय तक काम, बढ़ती लागत, उदासीन प्रबंधन और अक्सर देर से मिलने वाले वेतन जैसी दिक्कतों का सामना कर रहे कर्मचारी अब सच्चे सर्वहारा की तरह बोलना शुरू कर रहे हैं। शेनझेन फैक्टरी के एक अन्य कर्मचारी गुआन गुओह कहते हैं, “अमीर लोग इस तरह से कर्मचारियों का शोषण करके पैसे बना रहे हैं। अब हमें साम्यवाद से ही उम्मीद है।” मजदूरों का कहना है कि अगर सरकार उनकी दशा में सुधार के लिए कोई बड़ी कार्रवाई नहीं करती तो मजदूर खुद कार्रवाई करने के लिए तैयार होंगे। पेंग कहते हैं, “मजदूर और ज्यादा संगठित होंगे। सभी मजदूरों को एकताबद्ध होना होगा।”        

यह (मजदूरों का संगठित होना) शायद पहले से ही हो रहा है। चीन में मजदूर-असंतोष के स्तर का आकलन करना कठिन है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी शुरुआत हो चुकी है। अपनी पिछली पीढ़ी से बेहतर जानकार और (इंटरनेट के चलते) ज्यादा सूचनाओं से लैस फैक्टरी मजदूरों की नई पीढ़ी बेहतर मजदूरी और काम के बेहतर वातावरण की अपनी माँगों को लेकर ज्यादा मुखर हो रही है। इस पर अब तक सरकार की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही है। नीति-निर्माताओं ने लोगों की आय में वृद्धि के लिए न्यूनतम मजदूरी बढ़ा दी है, मजदूरों को और अधिक संरक्षण देने के लिए श्रम कानून कड़े कर दिए हैं, और कुछ मामलों में उन्हें हड़ताल की अनुमति भी दी है। लेकिन सरकार अब भी, अक्सर बलपूर्वक, स्वतंत्र मजदूर ऐक्टिविज़्म को हतोत्साहित करती है। ऐसी नीतियों ने चीन के सर्वहारा वर्ग को उनके सर्वहारा अधिनायकों के प्रति सशंकित कर दिया है। गुआन कहते हैं, “ सरकार हमसे ज्यादा कम्पनियों के बारे में सोचती है।” देश की तरक्की से आम चीनवासियों को ज्यादा फायदा पहुँचे, इसके लि यदि झाई अर्थव्यवस्था में बदलाव नहीं करते तो इससे सामाजिक असंतोष को बढ़ावा मिलेगा।       

मार्क्स ने ऐसे ही परिणाम की भविष्यवाणी की थी। जब सर्वहारा अपने सार्वभौम वर्ग-हित के प्रति जागृत होंगे, वे अन्यायपूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकेंगे और उसके स्थान पर एक नयी सम्पन्न समाजवादी व्यवस्था स्थापित करेंगे। मार्क्स ने लिखा था, “कम्युनिस्ट खुली घोषणा करते हैं कि उनका लक्ष्य तभी पूरा होगा जब सभी वर्तमान सामाजिक स्थितियों को बलपूर्वक उखाड़ फेंका जाए। सर्वहारा-वर्ग के पास खोने के लिए उनकी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है।” इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि दुनिया के मजदूरों में अपनी कमज़ोर स्थितियों को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। बढ़ती बेरोज़गारी और कड़े उपाय, जिनके कारण हलात बदतर हो रहे हैं,  के विरोध में मैड्रिड और एथेंस जैसे शहरों की सड़कों पर दसियों हज़ार लोग उतर चुके हैं।  

हालांकि अभी तक मार्क्स की क्रांति घटित होनी बाकी है। (क्योंकि) भले ही कामगारों की समस्याएँ एक जैसी हों, लेकिन उनके समाधान के लिए वे परस्पर एकताबद्ध नहीं हैं। उदाहरण के लिए, आर्थिक मंदी के दौर में अमेरिका में यूनियन-मेम्बरशिप में गिरावट जारी रही, जबकि वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो आंदोलन सरगर्म रहा।

पेरिस विश्वविद्यालय में मार्क्सवाद के विशेषज्ञ जैक्स रैंसियर कहते हैं कि विरोध-प्रदर्शनकारी पूँजीवाद को हटाने का लक्ष्य लेकर नहीं चल रहे हैं, जैसा कि मार्क्स ने कहा था, बल्कि वे तो इसमें कुछ सुधार चाहते हैं। रेंसियर स्पष्ट करते हैं, “हमें विरोध-प्रदर्शनकारी वर्ग द्वारा वर्तमान सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंकने या उनके विनाश की कोशिशें नहीं दिखायी दे रही हैं। आज के वर्ग संघर्ष से जो चीज़ पैदा हो रही है वो ये कि कमाए गए धन के पुनर्वितरण के द्वारा ये व्यवस्थाएँ लम्बी अवधि के लिए और अधिक व्यवहार्य तथा टिकाऊ बन सकें, इसके प्रयास साफ दिख रहे हैं।”     

ऐसे प्रयासों के बावजूद, मौजूदा आर्थिक नीतियों के चलते वर्गीय-तनाव का पोषण जारी है। चीन में, वरिष्ठ पदाधिकारियों ने इनकम गैप को कम करने के लिए जुबानी जमाखर्च तो बहुत किया है लेकिन हकीकत में उन्होंने उन बदलावों (जैसे भ्रष्टाचार से मुकाबला, फाइनेंस सेक्टर को उदार बनाना आदि) को ताक पर रख छोड़ा है, जिनसे कि ऐसा मुमकिन हो सकता था। कर्ज के बोझ से दबी यूरोप की सरकारों ने, बेरोज़गारी में बढ़ोत्तरी और अवरुद्ध विकास के दौर में भी, जनकल्याण की योजनाओं को बंद कर दिया है। ज्यादातर मामलों में पूँजीवाद में सुधार के लिए अपनाए गए समाधान कहीं अधिक पूँजीवादी रहे हैं। रोम, मैड्रिड और एथेंस में नीति-निर्माताओं पर बॉन्डधारकों की ओर से इस बात के लिए दबाव डाला जा रहा है कि कामगारों का संरक्षण बंद किया जाए और फिर घरेलू बाजारों को नियंत्रणमुक्त कर दिया जाए। Chavs: The Demonization of the Working Class के ब्रिटिश लेखक ओवेन जोंस इसे “ऊपर वालों का वर्ग-संघर्ष” कहते हैं।             

लेकिन संघर्ष करने वालों की संख्या सीमित है। वैश्विक श्रम बाज़ार के अभ्युदय से समूचे विकसित विश्व में यूनियनें निष्प्रभावी हो गयी हैं। मार्ग्रेट थ्रेचर और रोनाल्ड रीगन के मुक्त बाज़ार के हमले से कोई विश्वसनीय वैकल्पिक रास्ता नहीं बनने से राजनैतिक वाम ने दक्षिणपंथी रुख अपना लिया। इस पर टिप्पणी करते हुए रैंसियर कहते हैं, “वास्तव में सभी प्रगतिशील या वामपंथी पार्टियों ने वित्तीय बाज़ारों के उदय और विस्तार, तथा, (यह सिद्ध करने के लिए कि वे बदलाव करने में समर्थ हैं) कल्याणकारी योजनाओं को वापस लेने में कहीं न कहीं योगदान अवश्य किया है। मैं समझता हूँ कि कहीं न कहीं श्रमिकों या समाजवादी पार्टियों या सरकारों की स्थितियों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहा है – वर्तमान आर्थिक व्यवस्थाएँ बहुतकमज़ोर दिख रही हैं।”

इससे एक खतरनाक संभावना का द्वार खुलता दिख रहा है : जिसे मार्क्स ने न केवल पूँजीवाद के दोष के रूप में पहचाना था बल्कि उन दोषों के परिणामों के बारे में भी बताया था। अगर नीति-निर्माताओं ने समान आर्थिक अवसर सुनिश्चित करने के लिए नयी व्यवस्था नहीं खोजी तो दुनिया के मजदूर एक होंगे। प्रतिशोध के लिए एक बार फिर मार्क्स प्रासंगिक हो सकते हैं। 

(अंग्रेजी से अनुवाद : आलोक कुमार श्रीवास्तव)

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